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सुप्रीम कोर्ट : इंसाफ की देवी ने बहुत देर से सुना मजदूरों का करुण क्रंदन

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Supreme Court
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मौलिक अधिकारों के इतना अधिक हनन के बाद भी चुप क्यों बना रहा सुप्रीम कोर्ट?

  • इंसाफ की देवी की आंखों में पट्टी बंधी होती है। वह देख नहीं सकती। लेकिन इस बीच में वह दौर भी देखने में आया जब लगा कि वह बहरी भी हो गई है जो उसे देश की सरकार द्वारा उत्पीड़ित किये गये लाखों मजदूरों का करुण क्रंदन 2 माह तक सुनाई नहीं दिया।
  • हमारे देश में जब करोड़ों लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है तो सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि हमारे अधिकारों का सबसे बड़ा संरक्षक यानि custodian इस पर चुप्पी साध कर क्यों बैठा रहा। उसे ये अधिकार देश के संविधान ने दिया है। देश में करोड़ों मजदूरों को बंधक बनाकर एक जगह पर रखने, उन्हें कई महीनो तक आधा पेट भोजन देने, अपने घर न आने देने के सरकारी आतंक का सामना करना पड़ा। उन्हें तपती सड़कों पर पैदल चलने और रेल की पटरियों पर कटने के लिए मजबूर कर दिया और देश का सुप्रीम कोर्ट चुपचाप ये सब देखता रहा।
  • मजदूरों के मुद्दे पर देश की सबसे बड़ा न्यायाल सुप्रीम कोर्ट तब जागा जब देश के 20 बड़े वकीलों ने उसे चिट्ठी लिखी। देश के तमाम स्वतंत्र मीडिया संस्थानों ने सुप्रीम कोर्ट की इस चुप्पी की निंदा की। सुप्रीम कोर्ट के 2 पूर्व जजों से इस संस्था की तीखी आलोचना की।
  • सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज गोपाल गौड़ा ने डेक्कन हेराल्ड में एक कॉलम लिखा था। इसमें लिखा गया था अदालत के अंदर झूठा बयान देने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट सरकार से सवाल पूछने और कार्यपालिका के जवाबदेह बनाने के अपने के अपने कर्तव्य से चूक गया है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अपने फैसले में कहा है कि कोविड-19 महामारी के मद्देनजर पलायन कर रहे मजदूरों से किराया न वसूला न जाये। इसके अलावा सरकार को शीघ्र की घर लौटने की इच्छा रखने वाले मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के निर्देश दिये।
  • दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश तब जारी किये जब देश के 20 बड़े वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट को एक चिट्ठी लिखी गई। जिसमें कहा गया था कि कोरोना महामारी के काल में जब देश का मजदूर सड़कों पर पैदल चलने, भटकती रेलगाड़ियों में दम तोड़ने, सड़क दुर्घटनाओं में पैदल चलने के मजबूर है उस दौर में सुप्रीम कोर्ट अपने संवैधानिक अधिकारों के निर्वहन और कर्तव्यों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहा है। इसके बाद जाकर सुप्रीम कोर्ट ने कोई फैसला जारी किया है।
  • मजदूरों का संकट उस दौर में जारी हुआ जब देश में लॉकडाउन लागू किया गया। बीते 2 माह से सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों के हालात पर चुप्पी साधे रखी। जब विभिन्न देश के विभिन्न हिस्सों में 200 से अधिक मजदूरों की मृत्यु हो गई। देश का तमाम मीडिया मजदूरों की दुर्दशा पर रिपोर्ट छापता/दिखाता रहा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने खुद को इस मामले में तटस्थ बनाये रखा। बीते 31 मार्च को पूर्व मजदूरों की स्थिति पर एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गैर जरूरी मुद्दा बताते हुए पेंडिंग में डाल दिया।
  • अगर इस समय ही सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों के मुद्दे पर दखल दे दिया होता और सरकार की जवाहदेही तय कर दी होती तो मई के महीने में जो मजदूर सड़कों पर पैदल चलते हुए दिखाई दिये शायद ऐसी स्थिति देखने को न मिलती।
  • सुप्रीम कोर्ट ने तर्क दिया कि लॉकडाउन के दौरान वह सिर्फ जरूरी मुद्दों पर ही सुनावाई करेगा जबकि रिपब्लिक टीवी के एंकर अरनब गोस्वामी की याचिका को रात में ही स्वीकार करके दखल दे दिया। उनके खिलाफ देश के अन्य राज्यों में दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया।
  • मजदूरों की दुर्दशा पर लगाई गई पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट की 3 सदस्यीय पीठ ने इसे राज्यों और केंद्र सरकार के विवेक पर छोड़ दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने याचिककर्ताओं को फटकार लगाते हुए कहा कि आप लोग अखबारों में खबरें पढ़कर आते हैं और उसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ये उम्मीद करते हैं कि अदालत फैसले कर दे।
  • उसी समय मद्रास हाईकोर्ट ने मजदूरों के हतों को देखते हुए फैसला लिया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस समय प्रवासी मजदूरों की समस्या को देखकर आंसू आ जाते है। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से मजदूरों के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिये।
  • 1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया था उस समय सुप्रीम कोर्ट का ऐसा ही रूप देखने को मिला था। देश के कुछ संविधानविद् और पूर्व जज मजदूरों पर सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी की तुलना 1976 के एडीएम जबलपुर फैसले से की है। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट का सबसे काला अध्याय कहते हैं। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया था। इस फैसले को एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल केस के नाम से जानते हैं।
  • कोरोना संकट के समय पर सुप्रीम कोर्ट कुछ तथ्यों पर विचार करने से चूक गया। सुप्रीम कोर्ट ये नहीं कह सकता है कि प्रवासी मजदूरों की समस्या सिर्फ सरकार की नीतियों से जुड़ा मामला है। यहां पर मजदूरों के जीवन, उनकी स्वतंत्रता, उनकी नौकरियां, उनके आत्मसम्मान से जीने के अधिकार का प्रश्न है। यहां पर संविधान द्वारा दिये गये मौलिक अधिकारों के हनन का संकट पैदा हो गयाहै।
  • यहां पर संविधान के अनुच्छेद 14, 19ए और 21 का सीधा उल्लंघन हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट का काम देश के नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करना भी है। सुप्रीम लोगों के मौलिक अधिकारों का सीधा संरक्षक है।
    सुप्रीम कोर्ट को संविधान ने अपनी और सरकार के फैसलों की व्याख्या करने की शक्ति प्रदान की है।
  • संविधान के अनुच्छेद 32 में इस बात का उल्लेख है कि कोई भी नागरिक अपने अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। सरकार की जिस कार्रवाई से देश की जनता को कष्ट पहुंच रहा हो, सुप्रीम कोर्ट उसमें दखल दे सकता है, सरकार को निर्देश जारी कर सकता है।
  • अहम सवाह यह है कि इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी के बावजूद देश का सुप्रीम कोर्ट चुप है। क्या उसे इतना कमजोर कर दिया गया है।
  • कभी प्रेस कान्फ्रेंस करके सरकार के तानाशाही रवैये के खिलाफ आवाज उठाने वाले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस आज राज्यसभा की सदस्यता की नियामत से नवाजे जा चुके हैं तो क्या ये मान लिया जाये कि संसद में पहुंच जाना ही मनुष्य के जीवन का अंतिम ध्येय हो चुका है। सारे नियम, अंतरआत्मा की आवाज, मानवीय मूल्य क्या ये सब किताबी बातें बन चुकी हैं।
  • क्या देश की जनता को अब यह मान लेना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट अब उनका रहनुमा न रहकर सरकार की जेबी संस्था हो चुकी है।
  • रेल से कटते मजदूरों, सड़कों पर बच्चा जनती महिलाओं, तपती सड़कों पर गरीबों के पावों में पड़े छालों के विषय सुप्रीम कोर्ट के लिए महत्वहीन हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट की दशा यह हो गयी है कि उसके जस्टिस तरुण रंजन गोगोई बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बन जाते हैं। उनके कार्यकाल की अवधि में एक महिला असिस्टेंट उनके ऊपर यौन शोषण का आरोप भी लगाती है। इस स्थिति को अपने पद और प्रतिष्ठा के दम पर हैंडल कर देते हैं। इस दौरान ऐसे निर्णय लेते हैं कि सरकार उसका इनाम उन्हें संसद सदस्य बनाकर करती है।
  • संसद सदस्य पर मैं सबसे ज्यादा जोर इस वजह से दे रहा हूं कि क्या मैं यह मान लूं आज की तारीख में सभी शक्तियों का केंद्र सिर्फ संसद रह गई है। संविधान और संवैधानिक संस्थाओं का अब कोई महत्व नहीं रह गया है।
    अब तो यह संदेह भी पैदा होने लगा है कि सुप्रीम कोर्ट तो छोड़ो सीबीआई, सीवीसी, सीएजी जैसी संवैधानिक संस्थाओं का भी कोई महत्व रह गया है या सिर्फ ये सरकार के हरम की कनीज बनकर कर रह गई हैं।
  • देश के संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को और राज्यों के हाईकोर्ट को सरकार के फैसलों की निगरानी करने की शक्ति इसी वजह से दी है कि जब सरकारें निरंकुशता की ओर जाने लगें, उससे जनमानस पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगे तो वे अंकुश लगा सकें। लेकिन किसी भी कोर्ट की ओर से कोई पहल दिखाई ही नहीं दी।
  • अब बड़ा सवाल है कि संवैधानिक संस्थाएं, सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट सभी सरकार के फैसलों पर चुप्पी साधकर बैठ जाएं तो फिर देश में आपातकाल घोषित करने की जरूरत ही क्या है। संविधान के अनुच्छेद 352, 356 और 360 का महत्व ही क्या है जिनके तहत राष्ट्रीय आपातकाल, राष्ट्रपति शासन और आर्थिक आपातकाल की घोषणा की जाती है। देश के नागरिकों को अनुच्छेद 19 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को निलंबित करने की जरूरत ही क्या है।
  • सवाल है कि यूपीए, गठबंधन सरकारों के दौर में सरकार के फैसलों पर गरजता-बरसता सुप्रीम कोर्ट चुप क्यों हो गया है। टूजी, कोयला स्कैम का शोर मचाने वाली सीएजी खामोश क्यों है, पूंजीपतियों को कर्ज देने वाले बैंक मैनेजरों को चेक एंड बैलेंस करने वाली सीवीसी को सांप क्यों सूंघ गया है और भ्रष्टाचार के मामलों पर डंडा चलाने वाली सीबीआई इतनी शक्तिहीन और ओजहीन क्यों दिखाई दे रही है।
  • कितनी बड़ी विडंबना है कि देश के सामने उसके इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी खड़ी है। एक मेडिकल आपात स्थिति और एक आर्थिक आपात स्थिति की चुनौतियां सामने खड़ी हैं और देश की सभी संवैधानिक संस्थाएं खामोश हैं। देश में सिर्फ एक संस्था प्रधानमंत्री कार्यालय ही रह गया है जो सारे फैसले ले लेगा। चाहे वे कितने ही जनविरोधी ही क्यों न हों लेकिन सभी को उन फैसलों को सिर झुकाकर स्वीकार करना होगा।
  • 22 मई को आई CMIE की रिपोर्ट के अनुसार देश में बेरोजगारी की दर बढ़कर 24 प्रतिशत हो गई है। मैं यहां पर बेरोजगारी की बात इस वजह से कर रहा हूं देश की जनता को यह बात समझनी होगी हर 100 में 24 लोग बेरोजगार हैं, यानि देश में गृहयुद्ध और भोजन के लिए होने वाले दंगों की स्थिति बहुत दूर नहीं खड़ी है।