Home political news जब मरना ही है तो काहे न गांव जाकर मरें!

जब मरना ही है तो काहे न गांव जाकर मरें!

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ये बात ज़माना याद रखे मज़दूर हैं हम मजबूर नहीं ।
ये भूख ग़रीबी बदहाली हरगिज़ हमको मँज़ूर नहीं ।

साहित्यकार कांतिमोहन सोज के ये पंक्तियां भारत के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ज्वलंत साबित हो रही हैं। हम अपने घरों, दफ्तरों में बैठकर बौद्धिक चर्चायें चाहे कितनी कर लें लेकिन वह व्यक्ति जिसके बिना न तो देश चल सकता है और न समाज आगे बढ़ सकता है, वह चीख रहा है कि डंडे की जोर पर कोई भी राष्ट्रवादी सरकार दूसरों की गलतियों का बोझ हमारे सिर पर डालने की कोशिश न करे।

मजदूरों की सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांवों में पहुंचने की खबरें आ रही हैं। दरअसल ये खबरें एक आवाज है जो कहना चाह रही है कि हे सरकार! देश के चुनिंदा अमीरों और आप की नाकामियों की वजह से अगर कोरोना वायरस देश में फैल गया है तो उसकी सजा हमें मत दो। वह कह रहा है कि अगर काम नहीं है तो हम भूखे मरने को तैयार हैं लेकिन अपने परिवार के साथ। वह कर रहा है कि अगर तुम कोरोना वायरस की विभीषिका को रोकने में नाकामयाब हो तो हम मरने को भी तैयार हैं लेकिन अपने परिवार के सामने। वह कह रहा है कि अपने ही देश में उसे शरणार्थियों की तरह कैंपों में मत डालो। वह अपने हाथों की बदौलत शान से जीता है और मरना भी सम्मान के साथ चाहता है। वह कानून-व्यवस्था का दुश्मन नहीं है लेकिन हालात का शिकार है। वह कह रहा है कि सड़क पर चलते हुए हमें डंडे मत मारो। हमारा अपमान मत करो।

mass exodus of labourers
mass exodus of labourers in delhi

कोरोना वायरस से उपजी महामारी से निपटने को केंद्र सरकार द्वारा घोषित किये 21 दिन की तालाबंदी के बाद दिल्ली के बस अड्डों में उमड़ी मजदूरों की भीड़ बेहद कड़वी दास्ता बयां कर रही है।
पता नहीं है सरकारों को क्या हो गया है। वे सोचती कुछ हैं, कहती कुछ हैं और करती कुछ हैं। बीते कई दिनों से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लगातार दिहाड़ीदार मजदूरों, घरविहीन लोगों के रहने, खाने-पीने की व्यवस्था की बात रहे हैं लेकिन उन्होंने अचानक ही डीटीसी की बसें लगाकर हजारों लोगों को आनंदविहार, धौलाकुआं बस अड्डों पर छुड़वा दिया। केजरीवाल की अपीलें लोगों को भरोसा दिलाने में नाकामयाब रहीं।
हजारों मजदूरों की भीड़ एकत्रित हो गई। लॉकडाउन का मतलब तो वैसे ही समाप्त हो गया। अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की। उन्होंने बसें चलाकर लोगों को अपने गंतव्य पर पहुंचाने का बीड़ा उठा लिया। अब वे वापस लौटे लोगों को 14 दिन के लिए सरकारी निगरानी में रखने की बात कर रहे हैं ये क्वारंटीन कितना कामयाब होगा वक्त ही बतायेगा। कहां तो मजदूरों के लिए राहत शिविर, रहने, खाने-पीने, इलाज जैसी सुविधाओं के इंतजाम की बात हो रही थी और कहां इन सरकारों ने हड़बड़ी में संक्रमण के खतरे को और बढ़ा दिया।
मजदूरों का पलायन बताता है कि केंद्र सरकार इन लोगों को यह भरोसा दे पाने में नाकाम रही कि वे भूख से नहीं मरेंगे। पीएम मोदी ने लॉकडाउन के ऐलान के बाद गरीबों के लिए 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपये के राहत पैकेज का भी ऐलान किया, लेकिन यह भी इन मजदूरों को भरोसा नहीं दिला पाया कि केंद्र या राज्य की सरकारें उन्हें भूख से नहीं मरने देंगी।
दरअसल ये भीड़ एक अविश्वास का नतीजा है। देश के सबसे कमजोर तबके को अपनी सरकार पर भरोसा ही नहीं है। और भरोसा हो भी कैसे! इतने सालों में सरकारों ने कभी इसे मजबूत करने की कोशिश ही नहीं की।