Home political news आखिर कहां विलुप्त हो गई है निष्पक्ष और तटस्थ पत्रकारों की प्रजाति?

आखिर कहां विलुप्त हो गई है निष्पक्ष और तटस्थ पत्रकारों की प्रजाति?

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पत्रकारिता को लेकर अकसर कहा जाता है वर्तमान समय में इसमें तटस्थता यानि निष्पक्षता की कमी है। बहुत कम पत्रकार ही हैं जो निष्पक्ष होकर अपनी बात रखते हैं। कुछ पत्रकार सरकार के साथ हैं, कुछ सरकार और नीतियों को खिलाफ अपनी बात रखते हैं उन्हें सरकार विरोधी पत्रकार की संज्ञा दी जाती है। कई बार उन्हें सत्तारूढ़ पार्टी का विरोधी और विपक्षी पार्टी का प्रवक्ता या मुखपत्र भी कहा जाता है।

  • पत्रकारिता अब सिर्फ अखबार या अखबार की छपाई नहीं अब ये वृहद रूप में मीडिया के रूप में सामने आ चुकी है। अब इसमें तकनीक का समावेश बहुत व्यापक है।
  • अखबार, पत्रिका के अलावा इसके आयामों में टेलीविजन समाचार चैनल, समाचार वेबसाइटों और सोशल मीडिया के आयाम भी जुड़ चुके हैं।
  • अब सवाल पैदा होता है कि मौजूदा दौर में मीडिया की तटस्थता कहां लुप्त होती जा रही है या यूं कहा जाए कि निष्पक्ष और तटस्थ पत्रकारों की प्रजाति विलुप्ति की कगार पर क्यों पहुंच गई है?
  • मीडिया शिक्षा संस्थानों में पत्रकारिता की शिक्षा या उसके आरंभिक दिनों से लेकर पूरे पत्रकारीय करियर में ‘निष्पक्षता’ एक सैद्धांतिक रूप से अनिवार्य शर्त के रूप में लागू की जाती है।
  • पत्रकारिता समूहों के संपादकीय सहयोगियों से लेकर सामान्य साधारण लोग, मित्र आदि सभी यही नसीहत देते मिल जायेंगे कि पत्रकार को पूरी तरह निष्पक्ष होना चाहिए।
  • उसे किसी का पक्ष लेकर अपनी कलम नहीं चलानी चाहिए।
  • लेकिन पत्रकारिता और उसकी निष्पक्षता को देखने के आयाम अलग-अलग हैं। पत्रकार डाकिया या न्यूज मशीन नहीं है जो सिर्फ सूचना को इधर से उधर पहुंचा दे या जानकारी को अपने अखबार, समाचार चैनल, वेबसाइट आदि के जरिए दूसरी तरफ पहुंचा दे।
  • पत्रकार की उससे भी बड़ी जरूरत तथ्य और सत्य के साथ खड़े होना है। उसे ये देखना होता है कि उसका सत्य जनता के पक्ष में कितना है। किस अनुपात में लोगों को उस सत्य से लाभ हो रहा है।
  • जनता के हित के लिए उसे कभी-कभी उसे अपने सत्य और तथ्य के साथ अकेले भी खड़ा होना पड़ सकता है। इसी को ही जनपक्षधरता भी कहते हैं।
  • जब पत्रकार किसी खबर या खबर पर अपना विश्लेषण रखता है तो उसके नजरिये का भी समावेश होता है। यह नजरिया उसके अनुभव, समझ और तथ्यों के विश्लेषण से क्रमागत रूप से विकसित होता है।
  • किसी विश्लेषण में उसकी वैचारिक निष्ठा उसकी जनपक्षधरता की वजह से होती है।
  • अक्सर एक ही मुद्दे, एक घटना या विषय पर अलग-अलग पत्रकारों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण या राय अलग-अलग देखने की मिलती है।
  • उदाहरण के लिए कोरोना महामारी को ले लीजिये, इसे लेकर पत्रकारों के तथ्य एक हो सकते हैं लेकिन जनपक्षधरता अलग-अलग है।
  • एक पत्रकार कहता है कि सरकार ने इस आपदा से निपटने में देर कर दी है। दूसरा कहता है कि सरकार ने समय रहते जो पूरे देश में लॉकडाउन लागू कर दिया इस वजह से कोरोना महामारी के फैलने की दर देश में नियंत्रण में है।
  • अब एक ही मुद्दे पर पत्रकार की रिपोर्टिंग और विश्लेषण अलग-अलग हैं इसका कारण है कि उसकी जनपक्षधरता अलग-अलग है।
  • जिसकी जनपक्षधरता के केंद्र में लोगों का जीवन होगा वह केंद्र सरकार की नीतियों के साथ खड़ा हुआ दिखायी देगा। लेकिन जो जीवन के साथ जीवन स्तर, अर्थव्यवस्था और समाज के निचले तबके के भी आत्मसम्मान को केंद्र में रखेगा वहां बहुत संभावना है कि उसकी रिपोर्टिंग आलोचनात्मक हो।
  • अभी तक मैंने जो बात कही यह एक पत्रकार के व्यक्तिगत करियर सिस्टम पर लागू होती है लेकिन बात मीडिया समूह से जुड जाती है तो पत्रकार की जनपक्षधरता उस समूह से भी प्रभावित होती है।
  • ज्यादार मीडिया समूहों के अपने आर्थिक, समाजिक स्वार्थ निहित हैं। इसके लिए विशिष्ठ पार्टी लाइन का अनुसरण करना उनकी मजबूरी है।
  • क्योंकि पत्रकारों का आर्थिक स्वार्थ उस समूह से जुड़ा है अत: अपने समूह के सामाजिक राजनीतिक एजेंडे को ढोना भी पत्रकार की मजबूरी है। अत: मीडिया समूह भी एक पत्रकार की जनपक्षधरता को निर्धारित करता है।
  • एक पत्रकार सही रूप से अपनी जनपक्षधरता या अपनी बात को सही निष्पक्ष या तटस्थ रूप से तभी सामने रख पायेगा जब वह एक वकील जैसा स्वतंत्र होगा। अपने आर्थिक स्वार्थों के लिए मीडिया समूहों पर आश्रित नहीं होगा। जब पत्रकार स्वयं में एक समूह होगा।
  • अब तक देश में इस स्थिति को लेकर बहुत प्रयास नहीं किये गये हैं लेकिन सोशल मीडिया के व्यापक रूप में सामने आने के बाद से हालात बदल रहे हैं। अभी सोशल मीडिया की पहचान फेक न्यूज या अफवाह फैलाने वाले तंत्र के रूप में है लेकिन जैसे -जैसे इस प्लेटफॉर्म से विश्वसनीय और स्तरीय पत्रकार जुड़ते जायेंगे यह जनता को विश्वस्त सूचनाएं और तटस्थ विश्लेषण उपलब्ध करा पायेगा।
  • आजादी के आंदोलन के दौर में जहां अंग्रेजी पत्रकारिता आमतौर पर ब्रिटिश हुकूमत के साथ थी, वहीं भाषाई पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन के साथ थी।

इस बारे में अमर उजाला समूह के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री कहते हैं-

vinod agnihotri journalist
vinod agnihotri, journalist
  • मुझे लगता है कि एक खबर पर अलग-अलग नजरिया गलत नहीं है। इससे पाठकों को एक ही मुद्दे विषय और घटना पर अलग-अलग नजरिया पढ़ने और सुनने को मिलता है।
  • लोकतंत्र की मजबूती और विकास के लिए यह बेहद सकारात्मक पहलू है और इससे समाज में बहस और विमर्श को बल मिलता है। दुनिया के विकसित लोकतांत्रिक देशों में मीडिया की यह प्रवृत्ति आम है।
  • इसके उलट एकाधिकारवादी और तानाशाही व्यवस्था वाले देशों में मीडिया सिर्फ चुनिंदा तथ्यों और उनके सरकारी विश्लेषण तक ही सीमित रहता है।
  • लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वस्थ मीडिया की जरूरत है। मुद्दों, घटनाओं और तथ्यों के विश्लेषण पर अलग-अलग नजरिये से बहस और विमर्श को बल मिलता है।
  • सूचना क्रांति के विस्फोट के बाद पत्रकारिता अब एक नए दौर में पहुंच गई है। उसे तटस्थता की जड़ परिभाषा के दायरे में बांधे रखना मुमकिन नहीं है।
  • लेकिन पत्रकारिता को मनमाने और एकतरफा सोच के भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता है। पत्रकारिता को तटस्थ नहीं बल्कि तथ्य और सत्यपरक होना चाहिए। शुरू से ही पत्रकारिता इसी बुनियाद पर खड़ी रही है।
  • बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर महात्मा गांधी जैसे पत्रकार स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी सेनानी थे। अगर ये निष्पक्ष होते तो सिर्फ अखबारों में संतुलनकारी लेख ही लिख रहे होते, लेकिन उनकी पक्षधरता थी और वह पक्षधरता देश की जनता और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति थी। लेकिन इस पत्रकारिता में तथ्य और सत्य परकता थी, जो इसकी ताकत थी जिसकी वजह से ब्रिटिश हुकूमत न उसे तोड़ सकी न झुका पाई। पक्षधरता के बावजूद यह पत्रकारिता न उन्मुक्त थी न खुले सांड़ की तरह बेलगाम थी। उसमें पत्रकारीय मूल्य भी थे और मर्यादा भी थी।
  • आजादी के बाद की पत्रकारिता की पक्षधरता राष्ट्र निर्माण के प्रति हो गई। उस जमाने के पत्र-पत्रिकाओं में राष्ट्र निर्माण और सामाजिक विकास के विमर्श की भरमार थी। उसमें सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों की जानकारी, आलोचना, विश्लेषण और सुझाव होते थे।
  • साठ के दशक के आखिर और सत्तर के दशक की शुरुआत में जब देश में मौजूदा कांग्रेस सरकार के प्रति असंतोष बढ़ रहा था, तब जनपक्षधरता और खोजी पत्रकारिता का नया दौर शुरू हुआ।
  • सरकारों और प्रशासन के घपले घोटाले नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार, गरीबों दलितों वंचितों पर अत्याचार, सांप्रदायिकता के उन्माद में अल्पसंख्यकों पर हिंसक हमलों की खबरें सुर्खियां बनने लगीं।
  • विचारोत्तेजक संपादकीय और लेखों से सरकारी नीतियों सामाजिक कुरीतियों राजनीतिक दलों के पाखंड पर तीखे हमले किए जाने लगे।
  • यह तटस्थ नहीं बल्कि सत्य और तथ्यपरक पत्रकारिता का नया दौर था। लेकिन आपातकाल में पत्रकारिता सेंसरशिप की जंजीरों में जकड़ गई। लेकिन जल्दी ही यह दौर भी बीत गया।
  • अस्सी के दशक तक पत्रकारिता का आयाम और भी व्यापक हो गया। राज्यों के बाद केंद्र की सत्ता से भी उसका टकराव बढ़ गया।
  • इस दौर में पत्रकारिता पर अंकुश लगाने के लिए बिहार प्रेस विधेयक और मानहानि विधेयक जैसे कानून बनाने की कोशिश हुई लेकिन पत्रकारों और जनता के विरोध की वजह से सरकारों को कदम वापस खींचने पड़े।
  • पत्रकारिता और अब मीडिया का नया रूप ले चुकी है। पत्रकारिता में वैचारिक लाइन पर विभाजन कोई नई बात नहीं है। पहले भी वैचारिक आधार पर पत्रकारों के खेमे स्पष्ट दिखाई पड़ते थे और अब भी।
  • लेकिन अब वैचारिक आधार के साथ-साथ अवसरवाद और व्यवसायिक हितों के दबाव ने पत्रकारों और मीडिया की तथ्यपरकता और सत्यनिष्ठा को प्रभावित किया है।
  • बड़े मीडिया संस्थानों में सीधे तौर पर कार्पोरेट जगत की हिस्सेदारी और मिल्कियत, राजनीतिक दलों की घुसपैठ और मीडिया मुगलों की राजनीतिक और व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं ने पत्रकारिता को तथ्य और सत्य से दूर कर दिया है। वह अपने स्वार्थों की पूर्ति के हथियार और आथिर्क साम्राज्य की रक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल हो रही है।
  • पत्रकारिता पर दबाव पहले भी थे और आज भी हैं। पत्रकारिता इन दबावों से पहले भी लड़ी है और आज भी लड़ रही है।
  • सोशल मीडिया के इस दौर में खबरों, घटनाओं के खुलासे और मुद्दों पर विमर्श पर बड़े मीडिया समूहों का एकाधिकार खत्म होता जा रहा है।
  • सत्ता प्रतिष्ठानों को अखरने वाली कई खबरें जब मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों ने छापने या दिखाने की हिम्मत नहीं दिखाई लेकिन बाद में इंटरनेट मीडिया में सामने आ गईं। इसके बाद उन खबरों के सामने लाना उसकी मजबूरी हो गई।
  • अब तो टीवी समाचार चैनलों ने ‘वायरल सच’ के नाम से सोशल मीडिया की खबरों को भी जगह देने का रास्ता निकाल लिया है। इसलिए सूचना विस्फोट के इस दौर में निष्पक्षता पत्रकारिता की जरूरत ही नहीं मजबूरी बनती जा रही है। इसे दूसरे शब्दों में तथ्य और सत्यपरकता भी कहा जाता है।

इस बारे में हिंदी कवि श्री रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां बहुत प्रेरणादायक हैं –
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।।