Home nation आखिर जनता को अब मीडिया की जरूरत ही क्याें है?

आखिर जनता को अब मीडिया की जरूरत ही क्याें है?

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  • कोविड-19 के कहर से जूझ रहे देश के मीडिया उद्योग ने सरकार से तत्काल अपने पिछले बकाया का भुगतान करने का आग्रह किया है।
  • मीडिया संस्थानों को सरकार, विभिन्न मंत्रालय सरकारी संस्थाएं, पीएसयू, बैंक आदि अपने विज्ञापन नोडल एजेंसी डीएवीपी (डायरेक्टरेट ऑफ एड्वरटाइजिंग एंड विजुएल पब्लिसिटी) के माध्यम से जारी करती है।
  • बीते एक दिन पहले इकनॉमकि टाइम्स में छपी रिपोर्ट के अनुसार डीएवीपी पर विभन्न मीडिया संस्थानों के 1500 से 1800 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है।
  • कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम को लेकर सरकार ने जो 21 दिन का लॉकडाउन लगाया है उसने मीडिया संस्थानों की कमर तोड़ दी है।
  • विज्ञापन एजेंसियों, निजी क्षेत्र में तालाबंदी से मीडिया संस्थानों का राजस्व मॉडल लगभग समाप्त हो चुका है।
  • पिछले वित्त वर्ष के विज्ञापन के पैसे जो डीएवीपी के माध्यम से तमाम मीडिया संस्थानों को सरकार जारी करती उसे सरकार ने अब तक जारी किया नहीं किया है।
  • प्रिंट मीडिया का 800 से 900 करोड़ रुपया अटका पड़ा है।
    दोनों माध्यमों का 1500 से 2000 करोड़ रुपया अटका पड़ा है।
  • नया विज्ञापन आ नहीं रहा है और सरकारी विज्ञापनों का पैसा अटका पड़ा है।
  • बीते 2 वर्षों में बड़ी  तादाद में छोटे न्यूज चैनल्स और छोटे अखबार तेजी के साथ बंद हुए हैं। अभी हाल में आउटलुक जैसी मैगजीन का प्रिंट एडीशन बंद हो गया। तमाम छोटी-मोटी अन्य मैगजीन बंद हो गईं।
  • सत्ताधीशों से सवाल पूछने वाले तमाम पत्रकारों को नौकरियां छोड़नी पड़ी हैं। संस्थान बंद होने के साथ तमाम अन्य पत्रकारों की नौकरियां चली गईं।

प्रख्यात पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेई इन हालातों में हो रही मीडिया इंडस्ट्री की दुर्गति के पीछे कुछ विशेष कारणों का उल्लेख करते हैं।

punya prasoon bajpayee
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  • वर्तमान हालात ये हैं कि उद्योगपतियों, कॉरपोरेट, व्यापारी, मजदूर, छोटे-मझोले दुकानदार, एमएसएमई, किसी का भी दर्द मीडिया दिखा नहीं रहा है।
  • पूरा मीडिया जिस वायरस की भयावहता तो दिखाने के पीछे लगा हुआ है वह वायरस देश में अन्य कितने प्रकार के वायरस पैदा कर रहा है इसका अंदाजा हमें बिलकुल नहीं लग रहा है।
  • हमें यह अंदाजा ही नहीं लगा पा रहे हैं कि इस वायरस की आड़ में देश कितने संकट में फंसता चला जा रहा है।
  • बड़ी समस्या यह है कि मीडिया सिर्फ वह दिखा रहा है जो सरकार लंबे समय से दिखाना चाह रही थी।
  • जनता से जुड़े मुद्दे मीडिया से बिलकुल ही नदारद हैं।
  • वर्तमान हालात में यह सवाल यह पैदा होता है कि जब जनता ही नहीं होगी तो इस मीडिया की जरूरत किसे पड़ेगी।
  • जब देश का 50 करोड़ मजदूर (संगठित और असंगिठत) देश में मारा-मारा घूम रहा है तो उसका दर्द मीडिया नहीं दिखा रहा है तो फिर उसे मीडिया की जरूरत ही क्या है।
  • मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में इसीलिए जाना जाता है ताकि वह सत्ता के दावों और उसकी जमीनी हकीकत के बीच में जो अंतर है उसे उजागर करे।
  • लेकिन मीडिया यह काम तो कब का छोड़ चुका है। वह तो सिर्फ सत्ता और सत्ताधीशों के गुणगान में लगा हुआ है।
  • मीडिया के मठाधीशों को यह समझ ही नहीं आ रहा है कि समाज में उसकी जरूरत क्या है। यह उसी तरह है जैसे कपड़े धोने वाला साबुन अपने उत्पाद की मार्केटिंग इस तरह से करे कि यह परफ्यूम की तरह सुगंध देता है लेकिन उससे कपड़े साफ न हो रहे हों तो फिर उस साबुन को कौन खरीदेगा।
  • मीडिया जिस सरकार से साथ खड़ी थी उस सरकार ने किस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था को पलीता लगा दिया और मौजूदा संकट ने आग में घी का काम कर दिया है। अब मीडिया सरकार से यह पूछने की स्थिति में है ही नहीं कि सरकार इस संकट से कैसे निपटेगी। अगर मीडिया सरकार से यह बात पूछ नहीं पायेगी तो फिर उसका समाज में औचित्य क्या होगा।
  • नौबत यह आ गई है सरकार देश को कलाकारों को जो पैसा देती थी वह देना बंद कर दिया है। देश में 190 सांस्कृति संस्थान हैं। इनसे 1664 कलाकार जुड़े हुए हैं। 175 अध्यापक हैं।
  • इन लोगों को 2018 और 2019 में पैसे का भुगतान नहीं किया गया है। इन कलाकारों को सरकार लगभग 14-15 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की अदायगी करनी होती है वह भी सरकार के पास नहीं है।
  • 2014 के बाद से सरकार ने अपने एजेंडे पर चलने वाले मीडिया संस्थानों पर इस हद तक धनवर्षा की कि वे सत्ता के लिए ही जीने और सरकार के लिए ही मरने लगे।
  • लेकिन अब देश के सामने संकट की स्थिति है।
  • लेकिन मीडिया की स्थिति यह है कि वह जनता के लिए काम कर ही नहीं पा रही है।
  • बैंक कैसे डूब गये, आरबीआई की स्थिति क्या है, आरबीआई से सरकार को जारी किये गये पैसे का सरकार ने क्या किया, बैंकों के डूबने से देश की अर्थव्यवस्था और लोगों की सेहत पर क्या प्रभाव पड़ा, बैंक लोन आखिर वापस क्यों नहीं आ पा रहे हैं। ये सभी जनता से जुड़े सवालों को मीडिया न तो उठाने की कोशिश कर है और न सरकार कुछ बता रही है।
  • न्यूज चैनल/अखबार बैंकों का संकट बता नहीं पा रहे हैं, आरबीआई के भीतर के संकट का कुछ पता नहीं चल रहा है।
  • इस संकट के समय सरकार की योजनाएं क्या होनी चाहिए, न मीडिया इस बारे में कोई सवाल खड़ा कर रहा है और न सरकार कुछ बता रही है।
  • अब मीडिया के सामने प्रश्न यह खड़ा है कि वह सरकार द्वारा प्रायोजित दीवाली और ताली-थाली का प्रचार करे या जनता से जुड़े मुद्दे बताये।
  • प्रवासी मजदूर, किसानों की समस्याएं, राशन दुकानों में वितरण की स्थिति, झुग्गी झोपड़ियों का जीवन, छोटे दुकानदारों की समस्याएं, जीएसटी देने वालों की स्थिति, बैंक कर्मियों की त्रासदी, हॉस्पिटल में डॉक्टरों की स्थिति, मेडिकल एक्विपमेंट्स की कमी को मीडिया दिखा ही नहीं रहा।
  • सवाल यह है अगर मीडिया सिर्फ सत्ता के गुणगान में लगा रहेगा, सरकार द्वारा प्रायोजित कृत्रिम त्योहारों का प्रचार करता रहेगा तो फिर जनता इसे देखना ही क्यों चाहेगी।
  • मीडिया का औचित्य सरकार से सवालों से जुड़ा हुआ है। इसी आधार पर देश कुल विज्ञापन राजस्व लगभग 7000 करोड़ रुपये में उसकी हिस्सेदारी तय होती है। अगर वह अपना काम करेगा ही नहीं तो फिर अन्य मनोरंजन चैनलों और न्यूज चैनलों में अंतर क्या रह जायेगा और जनता उसपर क्यों विश्वास करेगी।