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पाखंड की नीतियां या नीतियों का पाखंड

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migrant workers moving on railway track
migrant workers moving on railway track
rajeev dwivedi
rajeev dwivedi

कोरोना महामारी की रोकथाम, प्रवासी मजदूरों की हो रही दुर्गति और घोषित आर्थिक पैकेज पर केंद्र सरकार की भ्रमित कर देने वाली नीतियों को लेकर कांग्रेस नेता राजीव द्विवेदी का विश्लेषण।   

  • देश में एक तरफ किसी एक व्यक्ति को कोरोना पॉजिटिव पाये जाने के बाद पूरी कॉलोनी को सील कर देने, लोगों के अवागमन पर प्रतिबंध लगा देने, कोरोना पॉजिटिव व्यक्ति के परिवार वालों से अपराधी की तरह व्यवहार करने का प्रोटोकॉल लागू है वहीं दूसरी ओर मजदूरों को उनके घर भेजने के नाम पर उनकी बेतहाशा भीड़ एकत्रित करने, रजिस्ट्रेशन के नाम पर धक्केशाही को बढ़ावा देने, उनको झुंड में पैदल ही अपने घरों की ओर चल देने को मजबूर करने देने की पाखंडवादी नीतियों का माहौल देश में बना हुआ है।
  • उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में ऐसा ही नजारा देखने को मिला जहां बिहार के मजदूरों को घर भेजने के लिए चलने वाली ट्रेनों में रजिस्ट्रेशन के नाम पर हजारों मजदूरों को एकत्रित किया गया। सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों की बातें सिर्फ घरों में कैद, सोसायटी, फ्लैटों में रहने लोगों की नियमावली में ही शामिल रह गईं हैं।

 

  • लॉकडाउन अब जनता के बीच सरकार की अलोकप्रियता की स्थिति पैदा कर रहा है इस वजह से अब प्रधानमंत्री या गृहमंत्री द्वारा सीधे अपने आदेशों से लॉकडाउन बढ़ाने से बचने का प्रयास किया जा रहा है।
  • इसके पहले के लॉकडाउन को जहां ताली-थाली बजवाकर और आतिशबाजी के माध्यम से लागू किया जाता रहा वहीं चौथे लॉकडाउन तक राज्यों से सुझाव मांगकर यह कार्य किया गया। 18 मई से लागू चौथे लॉकडाउन को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के मार्फत लागू किया गया। यह 31 मई तक लागू रहेगा।

 

  • अब इस लॉकडाउन में कुछ प्रतिबंधों को साथ ज्यादातर स्थानीय स्तर पर वाणिज्यिक गतिविधियों को खोल दिया जायेगा। वाणिज्यिक गतिविधियों के खुल जाने से कोरोना नहीं फैलेगा और रेलगाड़ियों के खुल जाने से (जिन्हें 30 जून तक के लिए निरस्त रखा गया है) उससे कोरोना फैल जायेगा। इन फैसलों को लेने की शक्ति सरकार को किन महानुभाव सलाहकारों की सलाह से प्राप्त हो रही है, यह कह पाना मुश्किल है।
  • केंद्र सरकार ने कोरोना से निपटने के फैसले लेने की शक्ति से कुछ पकड़ ढीली की है। अब कोरोना मामलों के हिसाब से फैसले लेने का अधिकार केंद्र ने राज्यों को सौंप दिया है। इसके अलावा लॉकडाउन के चौथे चरण में कुछ प्रतिबंधों को जारी रखने या उनपर ढील देने के अधिकार भी केंद्र ने राज्यों को दिये हैं। मतलब यह है कि पीएमओ अब इस लड़ाई में राज्य और जिला स्तर पर उन्हें अपने साथ लेने के लिए राजी हो गया है।

 

  • कोरोना से लड़ाई में केंद्र सरकार से राज्यों को साथ लेने की मांग  सबसे पहले यह मांग कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उठाई थी और अब इस मांग को कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी जोर-शोर से उठा रहे थे।

 

कोरोना काल में सरकार का यह पाखंड सिर्फ इस महामारी से निपटने के उपायों में ही दिखाई नहीं दे रहा बल्कि उससे उपजे आर्थिक संकट से त्रस्त जनता के जख्मों पर मरहम लगाने के तौर-तरीकों में भी दिखाई दे रहा है।

 

  • लॉकडाउन के चौथे चरण को लागू होने से कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की। इस घोषणा ने कुछ समय के लिए सरकार के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखने वालों के साथ विपक्षी पार्टियों को कुछ समय के लिए ही सही लेकिन नि:शब्द कर दिया। लगने लगा कि देश के परेशान मजदूर और आर्थिक रूप से टूट रहे मध्यवर्ग के लिए अब कुछ मरहम सरकार लेकर आने वाली है।
  • प्रधानमंत्री ने ठोक कर घोषणा की वे देश के कुल घरेलू उत्पाद के 10 प्रतिशत हिस्से से जनता के दुख-दर्द दूर होने वाले हैं। लेकिन सरकार ने राहत पैकेज के नाम पर भविष्य दिखाने की कोशिश की है। जब देश का हर चौथा व्यक्ति बेरोजगार है उसे तत्काल आर्थिक मदद की जरूरत है ऐसे वक्त में सरकार ने भविष्य के आर्थिक सुधारों की पोटली जनता के सामने रख दी है।

 

  • प्रधानमंत्री द्वारा घोषित राहत पैकेज वित्तमंत्री द्वारा 5 भागों में अलग-अलग टुकड़ों में पेश किया गया। इसका विश्लेषण करने पर समझ में आया कि यह राहत पैकेज नहीं बल्कि लोन बांटने की योजनाएं हैं। आम लोगों को राहत के नाम पर की गई ज्यादातर घोषणाएं पहले ही बजट में या किसी अलग फंड में की जा चुकी हैं अब उसे राहत पैकेज बताकर जनता के सामने पेश कर दिया गया है।
  • इस पैकेज में असंगठित क्षेत्र के कामगारों, निर्माण क्षेत्र के मजदूरों, या ऐसे कामगार जिनका कहीं पंजीयन नहीं होता, उनके लिए न कोई प्रावधान न कोई आवंटन।
  • देश की जीडीपी का 10 प्रतिशत दावे वाले इस पैकेज पर बुद्धिजीवी वर्ग सवाल खड़ा कर रहा है। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के अनुसार 20 लाख करोड़ का यह पैकेज एक लाख 80 हजार से ज्यादा कुछ भी नहीं है। वास्तव में यह पैकेज जीडीपी का एक प्रतिशत (0.91%) भी नहीं है।
  • कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के अनुसार देश के सबसे निचले तबके से संबंध रखने वाले 13 करोड़ परिवार इस पैकेज के दायरे से बाहर हैं। इस पैकेज में लोगों के दुख-दर्द की बुरी तरह से अनदेखी की गई है। कांग्रेस पार्टी का कहना है छोटे और मझले उद्योगों (एमएसएमई) के लिए सरकार ने कर्ज आधारित पैकेज पेश किया है।

 

  • सवाल उठता है कि कि पहले ही देनदारियों और कर्ज के बोझ तले ये उद्योग अपने ऊपर ऐसे समय नया कर्ज लेंगे जबकि बाजार में उनके उत्पादन के खपत को लेकर संशय है। कांग्रेस ने इस पैकेज पर दोबारा विचार करने और लोककल्याणकारी स्वरूप में पेश करने की मांग की है।

 

  • इस आर्थिक पैकेज का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि भारतीय रिजर्व द्वारा पहले ही घोषित किये गये 8 लाख करोड़ रुपये के प्रावधान को इसमें शामिल कर लिया गया है और अब इसे जानबूझ कर बढ़ाचढ़ा कर 20 लाख करोड़ रुपये का बना दिया गया है। इसमें से 11 लाख करोड़ का हिस्सा लोन के रूप में दिया जाने वाला है। इसमें कुछ मामलों में सरकार इस लोन की गारंटी लेगी। यह पैसा सरकार नहीं देगी बल्कि बैंक और वित्तीय संस्थान देंगे।
  • इस साल के बजट में सरकार ने मनरेगा के लिए करीब 61000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था, इसमें 40,000 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी और कर दी है। मनरेगा की मजदूरी 180 रुपये से बढ़ाकर 202 रुपये प्रतिदिन कर दी गई है। इसके अलावा महिलाओं के जनधन खातों में 500 रुपये 3 माह तक डाले जायेंगे। सरकार के अनुसार 20 करोड़ खातों में यह पैसा जायेगा।
  • सरकार ने किसानों के हितों के नाम पर उन्हें भविष्य दिखा दिया है। Essential Commodities act में सरकार बदलाव करेगी। किसान इसके बाद अपनी उपज को कहीं भी बेच सकेगा। लेकिन यह जब होगा तब होगा अभी लोगों को तत्काल राहत की जरूरत है।

 

  • सरकार जो धन डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिये लोगों को दे रही है वह मनरेगा और जन‍धन खातों के जरिये दिया जा रहा है। यह पैसा मात्र 1.5 लाख करोड़ रुपये ही है। जोकि जीडीपी का 0.75 प्रतिशत ही बैठता है।
  • कोरोना संकट के शुरुआती चरण से जिस तरह से देश में 12 करोड़ लोगों की नौकरियां तुरंत चली गई हैं, जो नौकरियां कर रहे हैं उनके वेतन में कटौती हो गई है।
  • इन सब हालात के बाद भारत एक अस्थिर अर्थव्यवस्था वाला देश बनने की ओर है। जब अर्थव्यवस्था ही अस्थिर हो उसमें निरंतरता न हो तो उस समय कोई उद्योग या व्यक्ति अपने ऊपर लोन क्यों चढ़ाना चाहेगा। जब उद्योग को पता ही न हो उसके द्वारा तैयार माल बिकेगा या नहीं या नौकरीपेशा व्यक्ति इस बात को लेकर संशय में हो कि उसकी नौकरी कभी भी जा सकती है, वेतन में कट लग सकता है। ऐसे में सरकार को लोन देने की नहीं बल्कि लोगों के हाथ में पैसा देने की जरूरत थी।

 

  • दुनिया के दूसरे देशों जैसे अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति 1200 डॉलर या ब्रिटेन में वेतन का 80 प्रतिशत देने का प्रावधान किया गया है। भारत में भी इसी तरह के प्रावधान किये जाने की जरूरत थी। 2008 में जब पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी के बादल छाये हुए थे और हर जगह नौकरियां जा रही थीं उस समय देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा पेश छठे वेतन आयोग में सरकारी कर्मचारियों के वेतन में औसतन 21 प्रतिशत की वृद्धि की गई थी।
  • इसमें अपंजीकृत मजदूरों की बात तो दूर मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा वर्ग के लोगों के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है। न तो उन्हें ईएमआई में छूट की कोई बात की गई और न ही नौकरियां बचाने की।
  • देश के तमाम हिस्सों से कंपनियों द्वारा अपने कर्मचारियों को अप्रैल और मई महीने का वेतन न देने और कर्मचारियों के प्रदर्शन खबरें आ रही हैं।
  • सरकार ने अगर निजी और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन का कुछ हिस्सा देने की घोषणा की होती तो कामगारों और कंपनियों दोनों को काफी राहत मिल जाती। जिन कर्मचारियों के घर के चूल्हे उन्हें मिलने वाले वेतन पर ही जलते थे अब उनके और उनके बच्चों के सामने भुखमरी की नौबत पैदा हो गई है।

 

  • जब दुनिया में 1930 वाली महामंदी या 2008 जैसी छोटी आर्थिक मंदी का संकट छाया तो दुनिया के देशों ने अपने बजटीय घाटे या राजकोषीय हितों की परवाह करना छोड़कर अपनी जनता को धन उपलब्ध कराया ताकि जनता उस पैसे से सामान और उपभोग की वस्तुओं को खरीदना शुरू करे। जब उपभोग शुरू होता है तो फैक्टरियों में उत्पादन की गतिविधियां भी शुरू होती हैं। फैक्टरियों में तैयार माल बिकता है, पूंजीपतियों के पास पैसा आता है वे अपने कामगारों और मजदूरों को वेतन देना शुरू करते हैं। इस प्रकार से अर्थव्यवस्था का जाम चक्का फिर से घूमना शुरू हो जाता है।
  • इस दौर में अमेरिका और यूरोप के शक्तिशाली देश भी अपने राजकोषीय घाटों या बजटीय घाटों की न तो चिंता करते है और न ही अपनी रेटिंग घटने का परवाह। उनकी पहली चिंता होती है जनता की जेब में पैसा पहुंचा कर बाजार में मांग पैदा करने की ताकि अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जा सके।

 

  • शहरों में अपना रोजगार गंवाकर गांव पहुंच रहे मजदूर और नौकरीपेशा मध्यमवर्ग सरकार से आर्थिक मदद की उम्मीद कर रहा है लेकिन सरकार मदद के नाम पर अपनी जनता को आंकड़ेबाजी का पाठ पढ़ा रही है। 30 लाख करोड़ का बजट एक दिन में जनता के सामने रख दिया जाता है लेकिन 20 लाख करोड़ के कथित आर्थित पैकेज के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 5 दिन का समय लिया। आधे से ज्यादा ऐलान बजट में किये जा चुके हैं लेकिन कोरोना महामारी के जख्म में मरहम के नाम पर इन प्रावधानों की घोषणा दोबारा की है।
  • जब देश का मजदूर अपना बोझा उठाये अपने बच्चों के साथ पैदल ही सड़क नाप रहा है उस समय सरकार आंकड़ों की बाजीगरी दिखा रही है।

 

  • बिना दूरगामी परिणामों की चिंता किये हुए भारत सरकार अब देश की रेटिंग और राजकोषीय घाटों की चिंता में लगी हुई है। जनता के खातों में पैसा पहुंचाकर उसे डायरेक्ट बेनिफिट देने के स्थान पर उसे आंकड़ों और वैश्विक स्तर पर अपनी छवि की चिंता हो रही है।
  • देश के सामने विडंबना है कि सत्ताधारी मान रहे हैं उनके घोषित की गई योजनाएं जनता के जख्मों का मरहम हैं। न तो लोगों से संवाद की जरूरत है और न ही उनकी समस्याओं की समझने की। हमने आंकड़ों की बाजीगरी दिखा दी और राहत जनता तक पहुंच गई।

 

  • देश की मंत्रमुग्ध सरकार खुश है कि उसके पास सदन में बहुमत है। कोरोना और आर्थिक संकट से त्रस्त देश की जनता चुनाव आने पर हिंदू-मुस्लिम, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और पाकिस्तान, आतंकवाद से डर के नाम पर अपना वोट उसे परोस देगी। सरकार को पूरा भरोसा है कि उसके पास सांप्रदायिकता, आतंकवाद, पाकिस्तान जैसे ब्रह्मास्त्र हैं। इनके सहारे वह अपने वोटों की फसल काट ही लेगी।
  • कोरोना को रोकने की नीतियों में पाखंड, मजदूरों को अपने गांव-घर पहुंचाने की नीतियों में पाखंड, ट्रेनों को चलाने में केंद्र और राज्यों के बीच पाखंड, आर्थिक पैकेज के नाम पर जनता से पाखंड। सवाल खड़ा होता है कि ये देश की दिशा और दशा का निर्धारण इन पाखंडों की नीतियों से कैसे और कब तक किया जायेगा और ये पाखंड की नीतियां हैं या नीतियों का पाखंड है।