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आखिर गोडसे ने गांधी जी को क्यों मारा?

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भारतीय की ज्यादार राजनीतिक पार्टियों यहां तक की कम्युनिस्ट पार्टियों के एजेंडे एक से हैं। सभी को गरीबी दूर करनी है, आर्थिक असमानता दूर करनी है, दबे-कुचले लोगों को न्याय दिलाना है, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार दूर करना है और विकास करना है। फिर भी देश के राजनीतिक सिस्टम को समझना बहुत मुश्किल है। देश की सबसे बड़ी पार्टियों भारतीय जनता पार्टी (BJP) और Congress (Congress) दोनों ही right wing की राजनीतिक पार्टियां कही जा सकती हैं। देश की जनता दोनों की पार्टियों को सत्तासीन कर चुकी है। दोनों को अपने-अपने एजेंडे चलाने के मौके मिल चुके हैं। Congress जहां देश के राष्ट्रीय आंदोलन से निकलकर आई है वहीं बीजेपी एक खास वर्ग, संप्रदाय की श्रेष्ठता स्थापित करने के एजेंडे पर चली है। तो जब दोनों हीं पार्टियां एक जैसी हैं तो फिर क्या दोनों में मूल अंतर क्या है। Congress से पहले बीजेपी को समझने की कोशिश करते हैं। बीजेपी को समझने के लिए आरएसएस (RSS) को समझना जरूरी है।

आखिर गोडसे ने गांधी जी को क्यों मारा?

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आरएसएस (RSS) को समझने के लिए सबसे नाथू राम गोडसे (nathuram godse) को समझना बहुत जरूरी है। वह गोडसे जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या का जम्मेदार है। नाथूराम गोडसे कोई अपराधी या सिरफिरा नशेड़ी नहीं था। पेशे से पत्रकार था और पुणे से ‘हिंदू राष्ट्र’ नामक एक अखबार का संपादन करता था। एक ऐसा पत्रकार जिसका शायद कलम की धार से विश्वास उठ गया था और जिसने बंदूक उठा ली थी।
37 साल का गोडसे अपने अखबार में हिंदू राष्ट्र की अपनी विचारधार को प्रमुखता से प्रचारित करता रहा था। वह अपने जीवन में नाकामयाब था। कोई बड़ी शिक्षा नहीं थी और तमाम व्यापार में असफल हो चुका था। उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने राष्ट्रीय स्वयं संघ के विचारों को अच्छी तरह से आत्मसात् कर लिया था और यहां से उसने अपने लिए एक नयी भूमिका तलाश ली थी। वह मुसलमानों और Congress को वह हिंदू पुनरुत्थान का सबसे बड़ा शत्रु मानता था और इनके खिलाफ संघर्ष का बीड़ा उठा लिया था।

हिंदुओं के कत्ल का जिम्मेदार गांधी और कांग्रेस!

आजादी के समय आरएसएस (RSS) और उसके कट्टर समर्थक नाथू राम गोडसे (nathuram godse) ने अपने समर्थकों को बताया था कि स्वतंत्रता की आड़ में Congress नेता देश के हजारों हिंदुओं का कत्ल करा रहे उनकी महिलाओं का अपहरण और बलात्कार करा रहे हैं। बंटवारे की वजह से देश के सामने बहुत बड़ी आपदा खड़ी हो गयी है। उसने अपनी अपने प्राणों की आहुति देकर भी मातृभूमि की रक्षा करे की शपथ ली थी।
देश की आजादी के समय वह गांधी जी और तत्कालीन परिस्थितियों से इस कदर नाराज था कि उसने स्वतंत्रता दिवस वाले दिन संपादकीय वाला कॉलम खाली छोड़ दिया और शोक जताने के लिए काली लाइनें खींच दी थीं। वह देश के बंटवारे के लिए महात्मा गांधी को साफ-तौर पर दोषी मानता था।

धधक रहे थी बदले की आग

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आजादी के समय हुए बंटवारे में हो रहे हिंदू-मुस्लिम फसाद से उसे गहरा मानसिक धक्का लगा था। वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख प्रचारकों में से एक था और और तत्कालीन Congress नेताओं और गांधी जी से बदला लेना चाहता था।
आजादी के समय राष्ट्रीय स्वयं संघ के सदस्य खुद को प्राचीन आर्यों का वास्तविक उत्तराधिकारी समझते थे। वे सिंधु की धारा से लेकर पूरब में वर्मा तक, उत्तर में तिब्बत से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक विशाल हिंदू साम्राज्य की स्थापना करना चाहते थे। वैसे तो पुणे और आसपास के क्षेत्रों में इनका वर्चस्व था लेकिन इन्होंने अपनी विचारधारा और संगठन की जड़ें पूरे देश में जमानी शुरू कर दी थीं।

गांधी की विचारधारा के प्रति RSS के मन कोई जग नहीं :

हिंदू-मुस्लिम भाईचारा और सांप्रदयिक सद्भाव की जिस विचारधारा पर गांधी ने अपना आंदोलन खड़ा किया था उसके लिए इनके मन में कोई स्थान नहीं था। गांधी जी का अहिंसा सिद्धांत इनकी नजर में कायरों का दर्शन था। Congress, गांधी और आरएसएस (RSS) के लोगों में जो एक चीज सर्वनिष्ठ थी वह था विभाजन का विरोध। लेकिन Congress और गांधी जी जहां विभाजन के लिए देश और दुनिया की तत्कालीन राजनीतिक स्थितियों को दोषी मान रहे थे, वहीं ये लोग इसके लिए गांधी और Congress को। आजादी के 71 साल बाद भी यह बहस अपने नतीजे पर नहीं पहुंच सकी हैं कि आखिर भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार कौन था। हाल में बौद्ध गुरु दलाई लामा ने देश के विभाजन के लिए प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की महत्वाकांक्षा को जिम्मेदार ठहरा कर इस विवाद को पुनर्जीवित कर दिया है।
इन लोगों को भारत के विभाजन से इस कदर पीड़ा थी कि वे तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटेन और मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना की हत्या की योजना बना रहे थे।

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हिंदू स्वास्तिक का हिटलर की नाजी आर्मी से वैचारिक संबंध

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इस सबके बावजूद ये नहीं कहा जा सकता कि आरएसए (RSS) के सदस्य राष्ट्रद्रोही थे या असामाजिक तत्व। उनमें व्याप्त हिंदू संस्कृति, मातृभूमि और राष्ट्रगौरव की भावना इस बात से समझी जा सकती है कि जब 15 अगस्त 1947 को पूरे देश में तिरंगा झंडा फहराया जा रहा था तो पुणे में केसरिया रंग का तिकोना झंडा फहराया गया था। इस पर स्वास्तिक का चिन्ह अंकित था। ये कोई मामूली चिन्ह नहीं था। इसने यूरोप के यहूदियों पर कहर ढाया था, दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की ढकेलने का सबसे बड़ा कारक था। हालांकि पुणे का स्वास्तिक नाजियों के स्वास्तिक से थोड़ा अलग जरूर था। लेकिन संदेश एक था और वह था श्रेष्ठता का, एकता का और निज गौरव का। शायद यह चिन्ह भी आर्यों के साथ भारत की भूमि पर पहुंचा। लेकिन इस तथ्य को पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता। आर्य कहां से आये ये विवाद, बहस और शोध का विषय हो सकता है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के कट्टर हिंदू खुद को इन आर्यों का वंशज मानते हैं। यही वजह है कट्टर हिंदू और उनके संगठन खुद को इस भूमि का वास्तविक उत्तराधिकारी मानते हैं। गांधी जी का अहिंसा सिद्धांत इनके उत्थान के चरण में कहीं भी सामंजस्य बनाता नहीं दिखता था। इस वजह से वे राष्ट्रपिता को हिंदू और भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे।

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मुसलमान आज भी लुटेरा है!

देश के सामने आज जो सबसे बड़ी समस्याओं से एक है वह असहिष्णुता और कट्टरपंथ की समस्या। ये कट्टरपंथी हिंदू पहले भी मुसलमानों को लुटेरा मानते और आज भी। उससे भी बड़ी समस्या यह है कि वे मोहम्मद बिन कासिम, फिरोजशाह तुगलक, बाबर, अकबर, औरंगजेब आदि का बदला आज के मुसलमानों से लेना चाहते हैं।
स्वास्तिक के चिन्ह को जर्मनी में हिटलर और भारत में आरएसएस (RSS) द्वारा अपनाये जाने का मूल कारण एक ही था। हिटलर ने जहां इस चिन्ह का प्रयोग अपने और अपनी जाति के स्वाभिमान की पुनर्स्थापना के लिए किया वहीं आरएसएस (RSS) के लोग इसकी तैयारी में थे।

स्वतंत्र भारत में आरएसएस (RSS) की भूमिका

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आजाद भारत में आरएसएस (RSS) की भूमिका को इस तरह से समझा जा सकता है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 26 जनवरी 1963 की परेड में इन्हें शामिल होने का निमंत्रण दिया था। कारण था 1961-62 के चीन युद्ध के समय देश में व्यवस्था कायम रखने और सैनिकों को खून देने में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। आरएसएस के दावे के अनुसार 22 दिन तक चले युद्ध में इन्होंने दिल्ली में यातायात व्यवस्था को सुचारु किया। इस वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी इनकी तारीफ की।