Home Business उम्मीद है इस बार नोटबंदी की गलतियों को नहीं दोहरायेगी सरकार!

उम्मीद है इस बार नोटबंदी की गलतियों को नहीं दोहरायेगी सरकार!

223
0
demonetisation
indian currency

जब देश के सामने किसी आर्थिक संकट की स्थिति पैदा होती है, तो हर तबके को सहारा देने के आयाम अलग-अलग होते हैं। जैसे वर्तमान में देश कोरोना वायरस संकट का सामना कर रहा है। इसके चलते देश में लॉकडाउन लागू है। जब यह लॉकडाउन खुलेगा तो सरकार को देश की अर्थव्यवस्था के तमाम घटकों जैसे गरीबों, मजदूरों, मध्यम वर्ग, छोटे उद्योगों, बड़े उद्योगों आदि को समर्थन देना होगा।

  • वर्तमान संकट में छोटे और बड़े उद्योगों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद सरकार के सामने दुविधा की स्थिति होगी कि वह पहले छोटे उद्योगों का साथ दे या बड़े उद्योगों को गतिशीलता। क्योंकि एक संकट के बाद दोनों के समाधान अलग-अलग हैं।
  • नोटबंदी भी एक संकट था। जिसके समाधान को लेकर सरकार ने बड़े उद्योगों को प्राथमिकता दी। इसका नतीजा ये सामने आया कि नोटबंदी के 3 साल बाद देश का शेयर बाजार तो अपने सर्वोच्चम स्तर पर पहुंच गया लेकिन बेरोजगारों की फौज खड़ी हो गई और बीते 3 वर्षों में आर्थिक विकास दर अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गई।
  • सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़ों के अनुसार 2019 में बेरोजगारी दर 7.5 प्रतिशत थी। 20 से 24 साल के युवाओं में बेरोजगारी की दर 37 फीसदी थी। ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी का औसत 2019 में 63.4 फीसदी तक पहुंच गया था। अब लॉकडाउन के बाद क्या होने वाला है इसका भगवान ही मालिक है।
  • नोटबंदी के बाद सरकार बेरोजगारी की समस्या पर लगाम लगाने में इसलिए कामयाब नहीं हो सकी क्योंकि इसने बीते 3-4 साल में सबसे अधिक रोजगार पैदा करने वाले छोटे और मध्यम उद्योगों की समस्याओं पर उचित ध्यान ही नहीं दिया।
  • अब देश में लॉकडाउन लागू है और अब छोटे व्यापारी को पटरी पर लाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
  • अगर सरकार ने अब सिर्फ बड़े औद्योगिक घरानों और बड़े सेक्टरों को केंद्र में रखकर नीतियां बनाईं और छोटे व्यापारी को डूब जाने दिया तो होगा ये कि बड़े बड़े प्रोजेक्ट जैसे सड़कें फ्लाईओवर, हवाईपट्टियां, रेल, यातायात के निर्माण की दिशा में काम होने लगेगा लेकिन बाजार में मांग नहीं होगी। क्योंकि गरीब और मध्यम वर्ग के हाथ में पैसा नहीं होगा। और ये पैसा इस वजह से नहीं होगा क्योंकि छोटे उद्योग अपने कर्मचारियों को वेतन देने की स्थिति में नहीं होंगे।
  • लॉकडाउन के बाद सरकार के पास सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह स्टिमुलस यानि राहत पैकेज देने के लिए धन से कहां से लाए। अब जब पूरा देश इतने दिनों से बंद पड़ा है, सभी उद्योग-धंधे बंद पड़े हैं तो सरकार को तमाम करों से होने वाली कमाई भी बंद पड़ी है।

आइए पहले समझते हैं ये स्टिमुलस पैकेज होता क्या है 

स्टिमुलस पैकेज एक राहत पैकेज की तरह होता है जो सरकार संकटग्रस्त वर्ग, सेक्टर या क्षेत्र को जारी करती है। ये पैकेज इस वजह से जारी किया जाता है ताकि कमजोर लोगों या उद्योग के हाथ में कुछ पैसा आए। इस पैसे से छोटे उद्योग अपने कर्मचारियों को वेतन देना शुरू करें। वे इस पैसे से अपनी जरूरत का सामान खरीदना शुरू करें, बाजार में मांग पैदा हो और अर्थव्यवस्था का चक्का घूमना शुरू करे। मनरेगा की मजदूरी और पेंशन के वितरण को भी स्टिमुलस पैकेज का हिस्सा मान सकते हैं।

सरकार को अपने खर्चों को पूरा करने में आ सकती है समस्या 

लेकिन अभी तो ऐसे हालात पैदा होने की आशंका है कि राहत पैकेज देना तो दूर की बात, सरकार को अपने खर्च चलाने के लिए भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। आखिरकार सरकार को अपने कर्मियों को वेतन तो देना ही है, मनरेगा जैसी योजनाओं में लगे लाखों मजदूरों को उनकी दिहाड़ी का भुगतान तो करना ही होगा।

अर्थव्यवस्था में कुछ भी मुफ्त नहीं आता

  • नये राहत यानि स्टिमुलस पैकेज जारी करने और अपने सरकारी खर्चों को पूरा करने के लिए ऋण लेना होगा। लेकिन अर्थव्यवस्था में कुछ भी मुफ्त का नहीं होता और ये ऋण भी मुफ्त में नहीं मिलेगा।
  • इस ऋण पर सरकार को जो ब्याज को अदा करना होगा उसकी भरपाई अंतत: देश की जनता को ही करनी होगी।
  • देर-सबेर जनता पर नये टैक्स लगेंगे। महंगाई बढ़ेगी और रुपये का अवमूल्यन होगा। यानि कि जो आज हम खबरों में सुन रहे हैं या आने वाले दिनों में सुनेंगे कि सरकार ने इतने हजार करोड़ का स्टिमुलस पैकेज गरीबों या उद्योगों के लिए जारी किया है उस राहत की भरपाई जनता को ही अपने पैसों से करनी होगी।

सामने होंगे 2 रास्ते 

  • भारत सरकार को अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए 2 रास्ते होंगे या तो वह बड़े उद्योगों और उड्डयन कंपनियों को अपनी बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए बैंकों के माध्यम से पूंजी उपलब्ध कराये या छोटे और मध्यम उद्योगों को सहारा दे।
  • छोटे और मध्यम उद्योगों को सहारा देने का लाभ यह होगा कि गरीब, कमजोर और मध्यम वर्ग के हाथ में पैसा आयेगा, जिससे उसकी क्रयशक्ति बढ़ेगी। अर्थव्यवस्था को तेजी मिलेगी जिसका धीरे-धीरे लाभ बड़े उद्योगों को भी मिलने लगेगा। लेकिन इसका क्या फायदा होगा कि कारों की फैक्टरियों में कारों का उत्पादन तो तुरंत चालू हो जाये लेकिन बाजार में कार के खरीदार ही न हों। या हवाई जहाज तो चलने लगे लेकिन उसमें चलने वाले यात्री ही नदारद हों।
  • इसका दूसरा पहलू यह भी है कि यदि बड़े उद्योंगो जैसे एयरलाइंस, आटोमोबाइल सेक्टर, रियल एस्टेट को यदि धन नहीं मिलेगा तो इनकी परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पायेंगी। लेकिन जब आम आदमी की क्रय शक्ति में इजाफा होगा तो पूंजी का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर होना तय है। यह विकास क्रमागत होगा, इसमें थोड़ा समय लग सकता है।

….तो बढ़ने लगेगी कारों की मांग 

जब आम आदमी की क्रय शक्ति में इजाफा होगा तो कुछ समय में कारों की बिक्री और हवाई यात्रा की टिकटों की मांग भी बढ़ जायेगी।

नोटबंदी के बाद सरकार की सबसे बड़ी गलती यही थी कि बड़े उद्योगों को ही धन उपलब्ध कराया गया। परिणाम यह हुआ कि तबसे हमारी विकास दर लगातार नीचे बनी हुई है। छोटे व्यापारियों की हालत खराब है। बेरोजगारी दर में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। लेकिन अब जरूरत होगी छोटे व्यापारी का धंधा बढ़ाने और आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ाने की। बेहतर होगा कि अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण 3 घटक बड़े उद्योग, छोटे और मझले उद्योग तथा आम आदमी का इस व्यवस्था में अनुपात तय किया जाये। तीनों के बीच बेहतर तालमेल बनाकर ही सरकार अर्थव्यवस्था के जाम चक्के को तेजी से घुमा पायेगी।