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हम आसमान देखते रह गये और ‘कोरोना’ हमारी जमीन खिसका कर ले गया

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CAA-NRC movement in India
CAA-NRC movement in India

महामारी नहीं, हमारे लिए ताली-थाली, नाचने-गाने का इवेंट है कोरोना

कोरोना वायरस और भारत सरकार के इससे निपटने के प्रयासों का देश की जननांकीय स्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण

चीन के वुहान में कोरोना वायरस के मामले पिछले साल दिसंबर में आने शुरू हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन से इस बीमारी को 11 मार्च 2020 को वैश्विक महामारी घोषित किया। दिसंबर से 25 मार्च तक इस वायरस के दुनिया भर में 4,46,000 मामले सामने आ चुके थे। दुनिया भर में इस काल तक 19000 से अधिक मौतें हो चुकी थीं।

  • अब हम अपने देश के संबंध में इस वायरस के प्रभावों के बात करते हैं। भारत में कोरोना वायरस का पहला मामला इस वर्ष 30 जनवरी को सामने आया। भारत सरकार से मिले आंकड़ों के अनुसार 25 मार्च तक इस बीमारी के 606 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। इसकी रोकथाम के लिए 24 मार्च को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में 21 दिनों के लिए संपूर्ण तालाबंदी की घोषणा कर दी।
  • इसका अर्थ यह है कि पूरे देश में सार्वजनिक परिवहन वितरण प्रणाली को पूरी तरह से ठप कर दिया गया है। ज्यादातर निजी और सरकारी उपक्रमों को बंद कर दिया गया है, व्यापारिक गतिविधियां लगभग समाप्त कर दी गई हैं। जरूरी सेवाओं से जुड़े लोगों को छोड़कर शेष को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया है।

इंटरनेट पर चल रहा चटकारों का दौर

corona virus tali thali
corona virus tali thali

सोशल मीडिया पर हिंदू मुसलमान और मंदिर मस्जिद के संदेशों का स्थान कोरोना, कर्फ्यू और तालाबंदी ने लिया है।

  • कर्फ्यू की स्थिति में कानून और व्यवस्था का पालन कराने को लेकर पुलिस की आम जनता पर की जा रही कार्रवाइयों की फुटेज खूब वायरल हो रही हैं। घरों में रह रहे मध्यम और उससे ऊंचे वर्ग से संबंध रखने वाले लोग इंटरनेट पर खूब चटकारे लेकर इस प्रकार के संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। लॉकडाउन के इस दौर में लोगों के पास खूब खाली समय है अत: व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के अन्य प्लेटफॉर्मों पर फनी मैसेज की बाढ़ आ चुकी है।
  • वायरल हो रहे संदेशों में दूसरे देशों से आ रही वे तस्वीरें और वीडियो भी हैं जिनमें वहां पर कोरोना वायरस से पीड़ित लोगों की स्थिति, वहां के स्वास्थ्य विभाग के तंत्र और मरने वालों के आंकड़े, उन देशों की स्थितियों की भारत से तुलना आदि शामिल है।
  • लोग इन संदेशों के माध्यम से अपने देशवासियों को घरों से बाहर न निकलने के पीएम के संदेश का खूब प्रचार कर रहे हैं और बता रहे हैं कि अगर उन्होंने घर से बाहर कदम निकाला तो उनका भी क्या हाल हो सकता है। यानि की इस समय देश में सिर्फ 2 तरह के ही व्यापार व्यवहार जोरों पर हैं, पहला फनी मैसेज और दूसरा डर।

लॉकडाउन का किस पर कितना असर

इस लॉकडाउन का फौरी असर मध्यम और अपर मध्यम वर्ग पर नहीं दिखायी दे रहा है क्योंकि ज्यादार लोगों ने अपने घरों को किचन, ग्रॉसरी और अन्य सामान से भर लिया है।

  • वर्तमान में इस तालाबंदी यानि लॉकडाउन के होने वाले दुष्प्रभावों का सबसे पहला शिकार देश का वो दिहाड़ीदार मजदूर तबका हुआ है जिसका जीवनयापन रोज कमाने और तब खाने के तंत्र पर टिका है।
  • निर्माण क्षेत्र से जुड़े मजदूरों की हालत बहुत खराब है क्योंकि किराया न चुका पाने की वजह से उनके मकान मालिकों ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इन मजदूरों में एक बहुत बड़ा तबका वह भी है जो वहीं पर रहकर अपना गुजारा करता है जहां पर काम करता है।
  • क्‍‍योंकि स्थानीय प्रशासन ने तमाम फैक्टरियों को बंद करा दिया है अत: इन मजदूरों के लिए रोजी-रोटी के साधन तो समाप्त हो ही गये हैं, उनके रहने का ठिकाना भी छिन गया है।
    खबरें आ रही हैं कमाने खाने और रहने के साधन छिन जाने के बाद तमाम मजदूर पैदल ही अपने घरों की ओर चल पड़े हैं क्योंकि सार्वजनिक परिवहन प्रणाली पूरी तरह से बंद है। दिल्ली, अहमदबाद, गाजियाबाद, लखनऊ, उन्नाव आदि से इस प्रकार की खबरें आ रही हैं। अहमदाबाद से कुछ मजदूर अपने बच्चों को लेकर बिहार की ओर पैदल ही निकल पड़े।

मजदूरों की सहायता या उनसे मजाक

कुछ राज्य सरकारों ने दिहाड़ीदार मजदूरों के लिए न्यूनतम गुजाराभत्ता देने की पहल की है। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली की सरकारों ने कुछ धन इन मजदूरों के खाते में ट्रांसफर करने की घोषणा की है लेकिन साथ में इनके पंजीकृत होने की शर्त भी जोड़ी है। सरकारों ने ये घोषणा मानवीय सहायता के मूल्यों के आधार पर की है।

  • सवाल ये खड़ा होता है कि मानवीय सहायता की जरूरत सिर्फ पंजीकृत मजदूर को ही है, गैर-पंजीकृत को नहीं है। गैर पंजीकृत मजदूर का भी देश के निर्माण में उतना ही योगदान है जितना पंजीकृत का। इस पंजीकृत और गैर-पंजीकृत में इस दुष्चक्र में मजबूर और मजदूर का फंसना तय है।

भविष्य की स्थिति

अब हम भविष्य में कोरोना वायरस की वजह से आयोजित तालाबंदी यानि लॉकडाउन से पड़ने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा करेंगे।

  • इस लॉकडाउन की वजह से देश के कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र का जर्जर होना तय माना जा रहा है। घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कारणों की वजह से पहले ही संघर्ष कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था का अब क्या हाल होने वाला है, अर्थशास्त्र की सामान्य जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी इसका अनुमान लगा सकता है।

कोरोना के टेस्ट का इंतजार तो 11 मुल्कों की पुलिस कर रही है

  • इस लॉकडाउन से पहले पूरे देश की जनता से ताली थाली बजवाने वाली भारत सरकार को यह बात भी पता होगी कि पटना में जिस मरीज की जान कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते चली गई उसकी रिपोर्ट उसके मरने के बाद आई।
  • जाहिर है कि देश में कोरोना का टेस्ट कराना कितना मुश्किल है खासतौर पर गरीब और मध्यम वर्ग के व्यक्ति के लिए। ये व्यक्ति सरकारी अस्पतालों/ संस्थाओं के भरोसे अपना टेस्ट तभी करवा पायेगा जब वह मौत के दरवाजे पर खड़ा होगा या निजी लैब वालों को हजारों रुपयों का भुगतान करने की स्थिति में होगा।
  • देश में टेस्टिंग किट, प्रयोगशालाओं की भारी कमी हैं। निजी लैबों को टेस्ट करने की अनुमति मिल चुकी है। एक टेस्ट की कीमत लगभग 4500 रुपये है। एक अध्ययन के मुताबिक देश में 10 लाख कोरोना टेस्ट की तुरंत जरूरत है। जाहिर है कि अरबों रुपये का पूंजी प्रवाह शीघ्र ही इन पूंजीपतियों की ओर होने वाला है।

जारी है लकीर पीटने का दौर

  • अब मैं इस बात का उल्लेख लेख में सबसे पहले ही कर चुका हूं कि देश में कोरोना वायरस का सबसे पहला मामला 30 जनवरी को आया था। चीन के वुहान में कोरोना के चलते पिछले माह दिसंबर के महीने में लॉकडाउन का फैसला लिया वहां की सरकार ने लिया था।
  • वुहान में पिछले वर्ष ही कोरोना का तांडव, ईरान, इटली, अमेरिका, स्पेन समेत अन्य देशों में जनवरी में ही इसकी वजह से शुरू हुई मौतों का सिलसिला क्या भारत सरकार को किसी ठोस नतीजे में पहुंचने के लिए पर्याप्त आधार नहीं थे।
  • सरकार ने 21 मार्च को इससे निपटने के लिए कोई पहला कदम उठाया और जनता कर्फ्यू लगा दिया। उस दिन बाकयदा तालियां, थालियां पिटवाकर इस त्रासदी को एक अच्छा खासा इवेंट का रूप दे दिया गया।
  • कहना न चाहिए लेकिन क्या करें – फरवरी में जब दुनिया कोरोना वायरस के कहर से कहर जूझ रही थी हम इसका तोड़ निकालने की बजाय दिल्ली दंगों में व्यस्त थे।
  • हमारे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म – नागरिकता कानून संशोधन, एनआरसी, मंदिर-मस्जिद, जैसे गैरजरूरी मसलों (जिनका देश के विकास से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है), से भरे पड़े थे। सरकारों के मंत्री गोली मरवाने के नारे लगा रहे थे। नेताओं की जुबानें जहर उगलने में लगी थीं।

जो होना चाहिए था वो हमने किया नहीं

  • क्या हमारी सरकार को 2 से 3 माह में कोरोना के कहर का अंदाजा हीं नहीं लगा। या उसे लगा कि यह बीमारी भारत में आ ही नहीं सकती। या भारत के लोग दैवीय कृपा से विशेष रोग प्रतिरोधक क्षमता से युक्त हैं।
  • क्या सरकार को फरवरी से ही विदेशों से आ रहे लोगों की देश में सीधे प्रवेश पर एक अवरोधक नहीं खड़ा कर देना चाहिए था। क्या उन्हें 15 दिन के लिए एयरपोर्ट के आसपास किसी होटल, अस्पताल, सार्वजनिक स्थान में क्वारंटीन करके जरूरत पड़ने पर उनका इलाज नहीं किया जा सकता था।
  • अगर ऐसा किया जाता तो हम देश में कोरोना वायरस के प्रवेश पर रोक लगा सकते थे। भारत सरकार को दूसरे देशों के हालात से सबक लेना चाहिए था। इसे समझने कि लिए सरकार के पास पर्याप्त समय था।

मारने से पहले सबक सिखायेगा कोरोना

अब पूरा देश लॉकडाउन है। आर्थिक विकास तो दूर की बात, गरीब आदमी की रोटी भी दांव पर लगी है। आज जो लोग घरों में बंद होकर मोबाइल पर कोरोना-कोरोना खेल रहे हैं भविष्य उनका भी असुरक्षित है।

  • कोरोना देश में कितने लोगों को मारेगा यह तो नहीं पता लेकिन विश्वास है कि सरकार, मीडिया और अंधभक्ति की लहरों में बह रही जनता को सबक अच्छा सिखायेगा।
  • यह सिखायेगा कि अभी वक्त है बेफिजूल के मुद्दों से बाहर निकलकर विकास की बात करने का, स्वास्थ्य की बात करने का, शिक्षा की बात करने का। कहीं ऐसा न हो कि हम आसमान देखते रह जायें और कोई कोरोना हमारे नीचे से जमीन खिसका कर ले जाये। -नित्येन्द्र द्विवेदी